Nrar Marutibhau Samadhi, Mehar Nagar, Shindhi (Meghe) Wardha At, Post, Thl, Dist;- Wardha , Pin-442001 MAHARASHTRA
Saturday, 8 August 2026
The Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill
The Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 introduces stricter government control over how non-governmental organizations (NGOs) and charities in India receive, manage, and utilize foreign funds.The bill was introduced in the Lok Sabha by the Ministry of Home Affairs and has become a major flashpoint in Parliament during the monsoon session.Key Provisions of the BillAsset Takeover: If an organization's FCRA registration ceases due to cancellation, surrender, or non-renewal, all assets created wholly or partly from foreign contributions will vest in a newly established government-appointed Designated Authority.Asset Freezes/Locks: Organizations under active investigation or with suspended registrations are strictly prohibited from selling, transferring, or mortgaging any foreign-funded assets.Ban on Proselytisation: The bill formalizes an explicit ban on utilizing foreign contributions for any activities tied to religious proselytisation (religious conversions).Minimum Spending Threshold: NGOs must demonstrate a minimum utilization of 10 lakh rupees ($7,856 USD) in foreign contributions over two preceding financial years to qualify for license renewal.Personal Accountability: Key functionaries—including directors, trustees, and managers—face elevated personal legal liability and accountability for compliance violations.Government Stance vs. CriticismsThe Government's View: Proponents and the Pib.gov.in maintain that the legislation plugs legal loopholes, enhances transparency, prevents the misuse of foreign donations, and safeguards national security.The Opposition's View: Opposition parties (such as Congress and the Left) and civil society groups have strongly pushed back, temporarily stalling the bill's passage. They criticize the asset-seizure framework as draconian, arguing it grants excessive executive power to seize community institutions like schools and hospitals, disproportionately impacting minority and grassroots organizations. Detailed tracking of the legislation is available via PRS Legislative Research.
Wednesday, 5 August 2026
सिपाही बबलू सिंह सेना मेडल (मरणोपरांत)
वीरता शब्द मनोभावों की वह पराकाष्ठा है जिसके आगे दुनिया का हर बल बौना हो जाता है | इस मनोभाव के पैदा होते ही सामने खड़े प्रतिद्वंदी की शक्ति, साहस सब कम पड़ जाते हैं, हर वह शक्ति क्षीण हो जाती है जो स्वयं को शक्तिशाली समझती है | इस मनोभाव से आच्छादित व्यक्ति एकाएक इतना बलशाली हो उठता है कि उसके सामने खड़ा पहाड़ भी कम्पित हो उठता है, वह उसके मनोभावों को आँखों में देखकर थर्रा उठता है | आज कृष्णनगरी के एक ऐसे ही यौद्धा का वीरगति दिवस है जिन्होंने अपने साहस और वीरता के बल पर एक अमित वीरगाथा लिखी , जिसे आने वाली पीढ़ियों को जानना चाहिए |
वर्ष 2016 में सिपाही बबलू सिंह 61 राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात थे और 61 राष्ट्रीय राइफल्स जम्मू और कश्मीर के आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में आतंकवाद-विरोधी अभियानों में लगी हुई थी। 29/30 जुलाई 2016 की रात में नौगाम सेक्टर में आतंकवादियों द्वारा सीमा पर कर भारतीय इलाके में घुसने की कोशिश की गई थी। 61 राष्ट्रीय राइफल्स की टुकड़ियाँ पहले से सतर्क थीं | । 30 जुलाई 2016 को लगभग 0030 बजे, नायक बिजेंद्र सिंह और सिपाही विशाल चौधरी एंटी-इंफिल्ट्रेशन ऑब्स्टिकल सिस्टम के साथ गश्त कर रहे थे | आतंकवादियों ने इस गश्ती दल पर फायरिंग की। इस गश्ती दल पर फायरिंग के बाद सिपाही बबलू सिंह और नायक राकेंद्र सिंह को गश्ती दल की सहायता के लिए एम्बुश इलाके में भेजा गया।
इसी बीच एक आतंकवादी आड़ में बड़े पत्थरों के पीछे छिप गया। सिपाही बबलू सिंह उस आतंकवादी को खोजते हुए दूसरे आतंकवादी के सामने आ गए | लगभग 15 मीटर की दूरी से उस आतंकवादी ने उन पर फायर कर दिया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए | घायल होने के बावजूद, सिपाही बबलू सिंह ने साहस और वीरता का प्रदर्शन करते हुए जवाबी कार्रवाई की और आतंकवादी को मार गिराया | घाव गहरा होने और तेजी से होते रक्तस्राव के कारण वह वीरगति को प्राप्त हो गए। सिपाही बबलू सिंह ने 29 साल की उम्र में अपने कर्तव्यों को सर्वोपरि रखते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया | उनकी असाधारण वीरता और साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत 'सेना मेडल' से सम्मानित किया गया।
सिपाही बबलू सिंह का जन्म कृष्ण नगरी मथुरा की सदर तहसील के फरह ब्लॉक के गांव झंडीपुर में 10 जुलाई 1987 को श्रीमती मुन्नी देवी और श्री मलूक सिंह के यहाँ हुआ था | उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दीन पब्लिक स्कूल से पूरी की और हाई स्कूल की शिक्षा जवाहर इंटर कॉलेज और इंटर की शिक्षा सेठ प्रेम सुखदास भगत इंटर कॉलेज से पूरी की | 18 साल की उम्र में सन 2005 में सेना की जाट रेजिमेंट में भर्ती हो गए । प्रशिक्षण के पश्चात 18 जाट रेजिमेंट में तैनात हुए | लगभग 11 साल की सेवा पूरी करने के पश्चात वह सन 2016 में 61 राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात हुए। | सिपाही बबलू सिंह के परिवार में उनके माता पिता के अलावा उनके चार भाई - श्री निर्भय सिंह, श्री हरिओम सिंह और चौधरी सतीश सिंह और एक बहन श्रीमती अंजना सिंह , उनकी पत्नी श्रीमती रविता देवी, बेटी गरिमा चौधरी और बेटे द्रोंण चौधरी हैं।
सिपाही बबलू सिंह की याद में उनके गांव में एक स्मारक का निर्माण किया गया है जिसमे उनकी प्रतिमा स्थापित की गयी है | इस स्मारक की सबसे खास बात यह है कि इस स्मारक के ठीक सामने टी – 55 टैंक (वॉर ट्राफी) स्थापित किया गया है | यह स्मारक उत्तर प्रदेश में अपनी तरह का पहला स्मारक है जिस पर टी – 55 टैंक लगा हुआ है | यह टी – 55 टैंक भाइयों में आपसी प्रेम और समर्पण की भी निशानी है | इस टैंक को अपने भाई के स्मारक पर लगवाने के लिए एडवोकेट सतीश चौधरी ने जो प्रयास किया वह अवर्णनीय और अपने आप में एक इतिहास है | इस टैंक को हासिल करने के लिए सिपाही बबलू सिंह के भाई चौधरी सतीश ने पिछले कई सालों तक मेहनत की, उन्होंने राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक, सम्बंधित नेताओं और अधिकारियों का दरवाजा खटखटाया, अनगिनत पत्र व्यवहार किया, तब जाकर सन 2023 में यह टी - 55 टैंक उन्हें मिला |
- हरी राम यादव
सूबेदार मेजर (आनरेरी)
अयोध्या/लखनऊ
7087815074
Saturday, 4 July 2026
आत्मविश्वास
प्रत्येक गोष्टीसाठी सतत दुसऱ्यावर दोषारोप करण्याचा जणू आपल्याला असाध्य रोगच जडला आहे. कुणीतरी आपल्याला मदत करावी, आपला भार हलका करावा अशी इच्छाच मुळात आपण का बाळगावी ? दुसऱ्यावर विसंबून राहाणे ही शुद्ध गुलामगिरी आहे. नशिबावर, कर्मावर, परिस्थितीवर व शेवटी दैवावर दोष लादून आपण मुक्त होण्याचा प्रयत्न करीत असतो. पण त्यामुळे साध्य मात्र काहीच होत नाही. ज्याच्या नसानसांत आत्मविश्वास सळसळतो तोच वीरपुरुष आव्हानांचे संधीत रूपांतर करू शकतो. आत्मविश्वास ही काही दैवी देणगी नाही. काळजीपूर्वक, स्वप्रयत्नाने त्याचा विकास करावा लागतो. यशस्वी झालेल्या महान व्यक्तींच्या जीवनात आपल्याला काय आढळते?प्रचंड आत्मविश्वास असूनही त्यांना नेहमीच यश प्राप्त झालेले दिसत नाही. त्यांनाही अपयशाचा सामना करावा लागतो. मग साधारण माणूस आणि महान व्यक्ती यांत फरक तो काय? फरक हाच आहे की महान व्यक्ती पराजय किंवा अपयश यांना कधीच अडथळे समजत नाहीत, तर त्यांना यशाचे दुर्गम शिखर गाठण्याच्या मार्गावरील पायऱ्या समजून निरंतर प्रयत्न करीत राहातात. परंतु साधारण व्यक्ती मात्र त्यामुळे निराश होऊन तिथेच आपले प्रयत्न सोडून देते. महान व्यक्तींचा त्यांच्यामध्ये वसत असलेल्या अनंत आत्मशक्तीवर विश्वास असतो व त्या बळावरच ते सर्व अडथळ्यांना पार करून यश प्राप्त करून घेतात. राजा भर्तृहरी आपल्या नीतिशतकात म्हणतो, "अपयश येईल या भीतीने मूर्ख माणूस कामाचा आरंभच करीत नाही, तर एखाद्या कामात थोडासा अडथळा निर्माण झाला की, सामान्य माणूस निराशेपोटी ते काम अर्धवट सोडून देतो. परंतु आत्मविश्वास असणारी व्यक्ती मात्र कितीही संकटे आली, अपयश मिळाले तरी यश मिळेपर्यंत थांबत नाही." (नीतिशतक : २७)
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मित्रांनो मी ब्रिगेडियर अनिल तळवलकर (निवृत्त) सेना मेडल यांचे परमवीर चक्र विजेत्यांच्या शौर्यकथा हे पुस्तक वाचले त्यात त्यांनी परमवीर चक्र व...